थूथुकुडी पुलिस फायरिंग एआइपीएफ जांच दल की रिपोर्ट

Thoothukudi-Police-Firing

(हमने ‘श्रमिक सॉलिडैरिटी के पिछले अंक में थूथुकुडी जनसंहार के बारे में छोटी सी रिपोर्ट छापी थी. जनसंहार के बाद थूथुकुडी जाने वाली पहली फैक्ट-फाइंडिंग (जांच) टीम एआइपीएफ (ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम) की थी. प्रस्तुत है इस अंक में उस फैक्ट-फाइंडिंग टीम की संक्षिप्त में रिपोर्ट. अभी जब यह अंक प्रेस में जाने को तैयार है, थूथुकुडी से बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार करने की खबरें आ रही हैं, जिनमें मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै बेंच के वकील एस वांचीनाथन, जो पीपुल्स राइट्स प्रोटेक्शन सेंटर के स्टेट कोओर्डिनेटर भी हैं, और जिन्होंने स्टरलाइट-विरोधी प्रदर्शन समूहों और जनता के कई केस लड़े हैं. एक और वकील के. हरिराघवन पर भी चार्ज लगाया गया है और उनकी अंतरिम बेल को अस्वीकार कर दिया गया है. इससे पहले तमिल टीवी कलाकार निलानी को इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उन्होंने थूथुकुडी में गोली चलाने के लिए तमिलनाडु सरकार की आलोचना करने वाला एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने टीवी में अपनी भूमिका के दौरान पहनने वाला पुलिस अफसर का कॉस्ट्यूम पहना हुआ था. तमिलनाडु में लोकतंत्र की हत्या की जा रही है - यहां सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिये कुछ नहीं कर रही है और नागरिकों के अपने द्वारा किए गये जनसंहार के बारे में पूरी बेशर्मी दिखा रही है.)

एआइपीएफ के एक जांच दल ने 27 मई 2018 को तूतीकोरिन शहर सहित आसपास की कई बस्तियों का दौरा किया. यह दल तूतीकोरिन स्थित सरकारी अस्पताल भी गया और दल के सदस्यों ने पुलिस की गोलियों और लाठियों से गंभीर रूप से जख्मी लोगों से मुलाकात की. इस जांच दल में सामाजिक विज्ञानी आर. विद्यासागर, बंगलौर के अधिवक्ता क्लिफ्टन, तिरुनेलवेल्लि के अधिवक्ता अब्दुल निजाम और तिरुनेलवेल्लि के सामाजिक कार्यकर्ता सुंदर राज शामिल थे. पेश है जांच दल की जांच रिपोर्ट का सार-संक्षेप:

जनता क्यों स्टरलाइट को बंद करवाना चाहती है ?

यह निर्विवाद तथ्य है कि स्टरलाइट तांबा संगलक संयंत्र (प्लांट) के परिचालन से उस क्षेत्र में भारी प्रदूषण फैला है जिसके चलते भूगर्भ जल और वायु काफी प्रदूषित हो गए हैं. आसपास के गांवों का जल गंदा हो जाने की वजह से ग्रामीणों को या तो 10 रुपया प्रति घड़ा पानी खरीदना पड़ता है, अथवा कंपनी द्वारा आपूर्ति किए गए पानी पर निर्भर रहना पड़ता है जो कि काफी अनियमित है. अधिकांश गांवों ने कंपनी द्वारा दिए गए पानी को लेने से इनकार कर दिया और फलतः उन्हें स्वच्छ जल के लिए काफी खर्च वहन करना पड़ता है. इस संयंत्र के उत्सर्जन से उनकी खेतीबाड़ी पूरी तरह बर्बाद हो गई. हवा की गुणवत्ता भी काफी गिर गई है. इससे लोगों के स्वास्थ्य पर घातक असर पड़ा है और उन्हें कैंसर, सांस की बीमारी, चर्म रोग समेत कई बीमारियां हो गई हैं. तथ्य तो यह है कि तुलनात्मक रूप से इस क्षेत्र के लोग कैंसर से काफी ज्यादा संख्या में मर गए हैं.

स्टरलाइट कॉपर वेदांता लिमिटेड की एक व्यावसायिक इकाई है, जो खुद लंदन स्थित वेदांता रिसोर्सेज - जिसके मालिक अनिल अग्रवाल हैं - की एक अनुषंगी कंपनी है. अप्रैल 2003 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस इकाई द्वारा उत्पन्न प्रदूषण के चलते स्टरलाइट पर 100 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था. ‘द नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इन्स्टीट्यूट’ ने 1998, 1999, 2003 और 2005 में जो रिपोर्ट पेश की थी, उससे पता चलता है कि स्टरलाइट कॉपर कारखाने के उत्सर्जन से पर्यावरण का जो प्रदूषण हो रहा है, वह तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित सीमा से कहीं अधिक है. ‘एनवायरनमेंट लॉ वल्र्ड अलायंस’ की एक रिपोर्ट, 2010 में साफ-साफ कहा गया है कि कॉपर संगलन प्रक्रिया से विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव पड़े हैं, जिसने दसियों किलोमीटर के क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है और जिसके चलते मानव स्वास्थ्य पर खतरा पैदा हो रहा है और जलापूर्ति प्रदूषित हो रही है.

अपनी स्थापना के समय से ही यह कंपनी बेखौफ होकर हर संभव पर्यावरणीय मानक का उल्लंघन करती रही है. इस संयंत्र के खिलाफ कानूनी लड़ाइयों समेत एक स्थायी मुहिम शुरू कर दी गई. 2010 में मद्रास उच्च न्यायालय ने कानून के उल्लंघनों और पर्यावरण के प्रदूषण को आधार बनाकर स्टरलाइट कारखाने को बंद करने का फैसला सुनाया. अविश्वसनीय रूप से, बंद करने के इस फैसले के तीन दिन के अंदर, सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर स्थगन आदेश दे दिया और स्टरलाइट कारखाने को चलते रहने का फैसला सुना दिया. तत्पश्चात, अप्रैल 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस कंपनी पर लगाए गए तमाम आरोपों को स्वीकारते हुए भी मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को दरकिनार कर दिया, और यह कारखाना चलता रहा.

जनता का आंदोलन

22 मई 2018 को जनता का वह विशाल प्रतिवाद इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. लोगों ने अपनी मांग बुलंद करने के लिए, यानी उस संयंत्र को बंद करवाने के लिए, लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे में जो भी साधन उपलब्ध थे, वह हर जरिया अपनाया. यह मान्य तथ्य है कि लगभग दो दशकों से ग्रामीण इस संयंत्र का विरोध कर रहे थे. उन लोगों ने तमाम संबंधित अधिकारियों तथा राज्य/केंद्र सरकारों के पास आवेदन भेजे. वे लोग न्यायालय की शरण में भी गए. उन लोगों ने संघर्ष के शांतिपूर्ण तरीके अपनाए, जैसे कि धरना, प्रतिवाद, अपने घरों पर काले झंडे लगाना, आदि. यह पता चला है कि इस घटना के पूर्व ऐसे सैकड़ों प्रदर्शन किए हैं जिनमें हजारों लोग शामिल हुए, लेकिन ऐसी अवांछित घटना कभी नहीं हुई. हाल-हाल तक, 28 मार्च को दसियों हजार स्त्री, पुरुष, बच्चे, वरिष्ठ नागरिक और नौजवान - जीवन के हर क्षेत्र से, हर पेशे से - प्रदर्शन में शामिल हुए थे. इस संयंत्र के आसपास के लगभग 20 गांवों से और थूथुकुडी शहर से आकर लोगों ने यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया, जो शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त भी हो गया.
इस संयंत्र को बंद करवाने की मुहिम के हालिया दौर में पिछले दो-एक वर्षों से थूथुकुडी शहर और गांव-दर-गांव में आंदोलन शुरू हो गए. हम लोगों ने खुद विभिन्न गांवों में लगाए गए संघर्ष कैंपों को देखा, जहां लोगों ने छोटे शामियाने खड़े कर रखे हैं और उन कैंपों पर संयंत्र को फौरन बंद करने की मांग वाले बड़े-बड़े बैनर टांग रखे हैं. इन संघर्ष स्थलों पर लगभग 100 दिनों से प्रति दिन लोग इकट्ठा होकर प्रतिवाद किया करते थे. ये लोग तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला कलक्टर के पास भी जा रहे थे और अपनी मांग से संबंधित ज्ञापन सौंप रहे थे. लेकिन आज के दिन तक इन ज्ञापनों का एक भी जवाब उन्हें नहीं मिला.

फायरिंग का दिन

22 मई के दिन चटाइयां, चादर और कुछ डब्बाबंद भोजन लिए वरिष्ठ नागरिकों, मर्द-औरतों और नौजवानों-बच्चों ने अपने-अपने गांव से कलक्टर कार्यालय की ओर कूच किया. इस दिन पहली दुखद बात तो यह हुई कि बड़ी संख्या में पुलिस बल ने कुछ गांवों में इन लोगों को रोक दिया. चंद गांवों में तो लोगों को जबरन पुलिस-गाड़ियों और बसों में भर कर ले जाया गया और उन्हें कलक्टर कार्यालय से काफी दूर उतार दिया गया. किसी-किसी गांव में लाठीचार्ज भी किया गया. फिर भी वे दृढ़ता के साथ लंबी दूरियां तय करते कलक्टर ऑफिस पहुंचे और वहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन में बैठ गए. इस दिन जिला प्रशासन ने अन्य जिलों से भी सैकड़ों पुलिसकर्मियों को बुला रखा था. प्रदर्शन के दौरान कुछ लोग ज्ञापन सौंपने के लिए कलक्टर ऑफिस के अंदर गए लेकिन उनपर लाठीचार्ज कर दिया गया और इसके बाद तो अंधाधुंध लाठियां और गोलियां बरसाई जाने लगीं, जिसमें 13 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हो गए. बदहवास लोग जान बचाने के इधर-उधर दौड़ पड़े, लेकिन पुलिस ने उनका पीछा करते हुए उन्हें पीटा. यह सब देर सुबह से दोपहर बाद तक चलता रहा.

जांच टीम को पता चला

यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर गोली चलाकर हत्या करने की मंशा से किया गया पूर्व-नियोजित हमला था. इसके पूर्व कोई चेतावनी नहीं दी गई और न फायरिंग के पहले भीड़ को तितर-बितर करने की कोई कार्रवाई ही की गई. स्पष्टतः यह लोगों के दिलोदिमाग में दहशत भरने और उस संयंत्र के खिलाफ कोई प्रतिवाद करने से हतोत्साहित करने के मकसद से ही ठंढे दिमाग से किया गया हमला था.
लोगों ने आरोप लगाया कि स्टरलाइट के गुंडे और सादे पोशाक में पुलिस रैली में घुस आए और उन्होंने हिंसा करने के लिए लोगों को उकसाया. कलक्टर ऑफिस पर लोगों के पहुंचने के पहले ही कई वाहनों और भवनों में आग लगाई जा चुकी थी.

लोगों ने कहा कि लोगों को रोकने अथवा फायरिंग के पहले वाटर कैनन या अश्रु गैस के गोलों का इस्तेमाल करने जैसी कोई चेतावनी नहीं दी गई और फायरिंग के पहले लोगों को कलक्टर ऑफिस के समीप जाने दिया गया. अपनी हिंसा को जायज ठहराने के लिए पुलिस ने कुछ जगहों पर आंसू गैस के गोले दागे.

यह छवि बनाने के लिए कि उस जगह के आसपास फसाद हुए हैं, पुलिस ने जानबूझकर कर अन्ना नगर और तिरसपुरम आदि स्थानों पर फायरिंग किया. लोगों का आरोप है कि अन्ना नगर में बगल में खड़े कलिप्पन को पहले पुलिस ने गोली मारी और फिर अपने बूटों से उसकी गर्दन कुचल डाली, ताकि उसकी मौत सुनिश्चित हो जाए.

यह आरोप लगाया जा रहा है कि आंदोलन के नेताओं को पहले से ही पहचान कर उनपर गोली चलाई गई और यह पुलिस तथा स्टरलाइट के गुंडों ने पूर्व से ही योजना बना रखी थी (गांवों में आंदोलनों के दौरान और सभाओं में उनके फोटो स्टरलाइट के गुंडों ने इकट्ठा कर लिए थे.)

लोगों ने जो कुछ कहा उससे स्पष्ट है कि फायरिंग के दौरान पुलिस ने कोई नियम का अनुपालन नहीं किया. घुटने के नीचे फायरिंग करने के बजाए अधिकांश मृतकों के सर, छाती और चेहरों पर गोलियां लगी थीं. गोलियां चलाने वाले पुलिस के जवान सादी पोशाक में थे और वे वाहनों की छत पर से फायरिंग कर रहे थे. वे लोग एक साथ कई गोलियां दागने वाली स्नाइपर बंदूकों का इस्तेमाल कर रहे थे, जो बिलकुल गैर-कानूनी है.

इस बर्बर हत्याकांड में एक स्कूली छात्रा (17 वर्ष) को मुंह के अंदर गोली मारी गई - वीडियो फुटेज में यह दृश्य सारी दुनिया ने देखा है.

तिरसपुरम के लोग आरोप लगा रहे हैं कि वहां की निवासी झांसी (लगभग 47 वर्ष) की ठंडे दिमाग से हत्या कर दी गई, जब वह बगल की सड़क पर रहने वाली अपनी बेटी को मछली देकर घर लौट रही थी. बहुत नजदीक से उसके चेहरे पर गोली मारी गई जिससे उसका भेजा उड़ गया. झांसी की बेटी ने बताया कि उसके शव की शिनाख्त भी नहीं करने दी गई और पुलिस इस हत्या को रफा-दफा करना चाहती थी. काफी जद्दोजहद के बाद उसे अपनी मां के शव की शिनाख्त करने की इजाजत दी गई.

लोगों ने बताया कि फायरिंग में मारे गए लोगों की संख्या 13 से भी ज्यादा है, क्योंकि कहा जा रहा है कि सरकारी अस्पताल के शवगृह में कई लोगों के मृत शरीर रखे हुए हैं. इस शहर और आसपास के गांवों से तमाम पुरुष अभी भागे हुए हैं, इसीलिए उन सब के लौट आने के पहले मृतकों की वास्तविक संख्या का पता नहीं चल रहा है.

यह भी कहा जा रहा है कि किसी पोस्टमार्टम के बगैर ही कुछ शवों को उनके परिजनों के हवाले कर दिया गया है. उनकी मौत का कारण भी नहीं बताया जा रहा है.

एआइपीएफ मांग करता है

  • स्टरलाइट संयंत्र को फौरन स्थायी रूप से बंद किया जाए,
  • तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्टरलाइट संयंत्र द्वारा नियम-कानूनों के तमाम उल्लंघनों और गैर-कानूनी हरकतों की जांच करे और अपने आदेशों को इतना मजबूत बनाए कि वे आदेश किसी भी कानूनी जांच और चुनौती के सामने टिके रह सकें,
  • स्टरलाइट के उन सभी गुंडों के खिलाफ हत्या के आरोपों के तहत कानूनी कार्रवाई की जाए जो 22 मई के दिन हिंसा की कार्रवाई में लिप्त थे,
  • अभी तक यह आधिकारिक वक्तव्य नहीं आया है कि गोली चलाने का आदेश किसने दिया था और इसके लिए किस-किस स्तर के अधिकारी जिम्मेवार थे. राज्य सरकार इनके नाम घोषित करे और हत्याकांड के जिम्मेवार लोगों को फौरन सेवा से बरखास्त करे,
  • जनता पर लगाए गए तमाम मुकदमे फौरन वापस लिए जाएं,
  • पुलिस फायरिंग में मारे गए और स्थायी रूप से विकलांग हो गए लोगों के परिजनों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए; जबतक वे अपनी आजीविका शुरू न कर सकें, तबतक उन्हें 15-15 हजार रुपये की पेंशन दी जाए,
  • पुलिस फायरिंग से प्रभावित लोगों को कानूनी सहायता प्रदान की जाए, ताकि वे पुलिस और जिला कलक्टर के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकें. तमाम पीड़ितों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जाए,
  • एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र समिति नियुक्त की जाए, जो कैंसर जैसे रोगों से मृत और पीड़ित लोगों की तकलीफों तथा स्टरलाइट संयंत्र के प्रदूषणों के चलते खेतीबाड़ी और मत्स्य कर्म की बरबादी से आजीविका के नुकसानों का मूल्यांकन करेगी और पिछले दो दशकों के दौरान लोगों को हुई क्षति के लिए स्टरलाइट के खिलाफ मुकदमा चलाएगी,
  • थूथुकुडी से पुलिस की तैनाती वापस ली जाए,
  • मोदी और पलानीस्वामी की सरकारें इस्तीफा दें,
  • कार्यरत जजों की एक टीम इस फायरिंग की जांच करे.

 

वर्षः 13
अंकः 4